वैराग्य क्या है? वैराग्य कब होता है?: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज द्वारा वैराग्य का स्वरूप



प्रायः लोग राग शब्द का अर्थ प्यार ही करते हैं, पर ऐसा नहीं है, राग का अर्थ है मन का लगाव, वह मन का लगाव प्यार से हो या खार से हो। अर्थात् अनुकूल भाव या प्रतिकूल भाव, किसी भी भाव से मन की आसक्ति, आसक्ति ही कहलाएगी और जब न अनुकूल भाव से आसक्ति हो और न प्रतिकूल भाव से आसक्ति हो तभी वैराग्य कहलायेगा ।

स्थूल बुद्धि से यों समझिये कि जब आप किसी प्रिय का चिन्तन करते हैं तो सदा सर्वत्र उसी में मन व्यस्त रहता है, यह कब मिलेगा, कैसे मिलेगा, कहाँ मिलेगा, बड़ा अच्छा आदमी है, हमारा हितैषी है, हमारा प्रेमी है' इत्यादि । ठीक इसी प्रकार, जिससे आपका द्वेष हो जाय, वहाँ भी सदा सर्वत्र मन व्यस्त रहता है कि वह कहाँ मिलेगा, कब मिलेगा, कैसे मिलेगा, वह हमारा शत्रु है, अनिष्टकारी है, उसे मारना है, इत्यादि ।

उपर्युक्त रीति से प्यार एवं खार दोनों ही में एक सी स्थिति मन की रहती है। यही प्रमुख कारण है कि अनुकूलभाव से मन को श्यामसुन्दर से एक कर देने वाली गोपियाँ भी भगवत्-स्वरूपा बन गयीं एवं प्रतिकूल भाव से मन को श्यामसुन्दर में एक कर देने वाले कंसादिक भी भगवत्स्वरूप बन गये।

बस, यही अवस्था वैराग्य की है। जैसे, एक माँ अपने खोये हुए पुत्र को मेले में ढूँढ़ती है। वह रोती हुई अपने बच्चे को खोज रही है। उसे एक बच्चा पीछे से दिखाई पड़ा जिसके कपड़े, आयु, कद, जूते आदि उसी के बच्चे के समान थे। वह उसी बच्चे को अपना बच्चा समझ बैठी और 'बेटा-बेटा' कहकर दौड़ी। जब उसका मुख देखा तो वह उसका बेटा न था। बस, उसे उस बेटे से वैराग्य हो गया, अर्थात् वह माँ न तो उस बेटे को प्यार ही करती है कि हमारा बेटा नहीं मिला न सही, चलो इसी से प्यार करें और न तो शत्रुता ही करती है कि 'क्यों रे, मैंने तो सोचा था कि तू मेरा बेटा है, तू पराया क्यों हुआ ? इत्यादि । बस, इसी अवस्था का नाम वैराग्य है।

जैसे, किसी शराबी को शराब के लिये मदिरालय जाना पड़ता है किन्तु मदिरालय के पूर्व कई दुकानें अन्य सामानों की पड़ती हैं। वह उन दुकानों के सामने से तो जाता है, देखता भी जाता है, किन्तु विरक्त है। अर्थात् न तो किसी दुकान पर खड़ा होता है कि चलो मदिरा न सही, इस दुकान पर रसगुल्ला ही खा लें और न तो झगड़ा ही करता है कि मुझे तो मदिरा चाहिये, तू रसगुल्ला की दुकान क्यों बीच में लगाये बैठा है, इत्यादि। वह सबसे विरक्त होकर अपने मदिरालय के लक्ष्य पर जा रहा है। बस, यही वैराग्य है। इस संसार में सब दुकानों से गुजरता हुआ अपने परमानन्द के केन्द्र भगवान् का दुकान पर ही सीधा जाय, अन्यत्र कहीं भी न राग हो न द्वेष हो ।

यह ध्यान रहे कि जब तक मन ईश्वर के अतिरिक्त अन्यत्र कहीं भी राग या द्वेष युक्त (आसक्त) रहेगा, तब तक ईश्वर शरणागति असम्भव है और जब तक संसार में, "न तो यहाँ हमारा आध्यात्मिक सुख है। और न यहाँ हमें बरबस अशान्त करने वाला दुःख ही है, ऐसा ज्ञान परिपक्व न होगा, तब तक वैराग्य भी असम्भव है।

इस परिपक्वता के लिये संसार के स्वरूप पर गम्भीर विचार एवं बार-बार विचार करना होगा, बार-बार विचार से ही दृढ़ता आयेगी। एक बार विचार करने मात्र से काम नहीं बनेगा क्योंकि अनन्तानन्त जन्मों का विपरीत विचार संगृहीत है।

आप लोग सोचते होंगे, जब मन संसार में राग-द्वेष रहित, अलग हो जायगा तब फिर क्या करना अवशिष्ट रह जायगा ? क्योंकि तब तो वासना का निर्माण ही न होगा। जब वासना का निर्माण न होगा तो उसकी पूर्ति में लोभ या अपूर्ति में क्रोधादि की उत्पत्ति ही न होगी, तब फिर अशान्ति या दुःख ही कैसे आ सकेंगे ? फिर शरणागति करने का व्यर्थ प्रयास क्यों किया जाय ?

किन्तु, यह सोचना भोलापन है। क्योंकि, एक तो मन विरक्त होकर वासना न बनावे यह असम्भव है क्योंकि जब तक परमानन्द न प्राप्त हो जायगा, उसकी स्वाभाविक वासना सदा रहेगी ही।

दूसरी बात यह कि राग द्वेष रहित मन क्या निश्चेष्ट पड़ा रहेगा, अर्थात् अपनी क्रिया बन्द कर देगा ? यह तो सर्वथा असम्भव है, क्योंकि कोई भी जीव एक क्षण को भी अकर्ता नहीं रह सकता, यह मैं पूर्व में ही सिद्ध कर चुका हूँ।

तीसरा कारण यह है कि अनन्तानन्त जन्मों के संस्कारों के कारण भी वासना की उत्पत्ति स्वाभाविक है, उसे कोई नहीं रोक सकता। चौथा कारण यह भी है कि जब तक माया का आधिपत्य जीव पर रहेगा, तब तक मायिक-वासना बनाना, यही जीव का स्वभाव होगा। पाँचवाँ कारण यह है कि ईश्वर प्राप्ति से ही जीव की कामना पूर्ति हो सकती है अर्थात् तृप्ति हो सकती है, उसके पूर्व असम्भव है। जैसे, प्यासे हिरन को जब तक वास्तविक जल न मिलेगा, वह मरुस्थलीय मिथ्या-जल से विरक्त भी हो जाय तो प्यास से विरक्त नहीं हो अतएव ईश्वर-शरणागति तो करनी ही पड़ेगी। सकता।

स्थूल दृष्टि से यहाँ समझ लीजिये कि यदि आप अपने घर जा रहे हैं। एवं मार्ग भूल गये हों और एक व्यक्ति आपको यह समझा दे कि यह मार्ग आपके घर का नहीं है क्योंकि आपके घर के मार्ग में अमुक पहिचान मिलती है, और आप समझ भी जायँ कि तुम ठीक कहते हो, मैं गलती पर था, किन्तु इतने जानने से आप घर न पहुँच सकेंगे। 'हमारा सांसारिक पदार्थों द्वारा वासनापूर्ति का मार्ग गलत है', यह ज्ञान तो हो गया जिसके परिणामस्वरूप वैराग्य भी हो गया किन्तु फिर, ‘हमारे परमानन्द-स्वरूप ईश्वरीय घर का कौन-सा मार्ग है', यह जानना होगा। इतना ही नहीं, उस मार्ग से चल कर घर भी पहुँचना होगा, तभी अभीष्ट सिद्धि होगी। अमुक-

कुछ लोग कहते हैं कि व्यर्थ में वैराग्य के चक्कर में क्यों पड़ा जाय, सीधे-सीधे ईश्वर में अनुराग करो बस, वैराग्य अपने आप हो जायगा। किन्तु विचारणीय यह है कि ईश्वर में अनुराग करोगे किससे एवं किसलिये करोगे? उत्तर यही मिलेगा कि मन से अनुराग करेंगे। और चूँकि ईश्वर में सुख है और सुख ही हमारा अभीष्ट है, इसलिये अनुराग करेंगे। परन्तु बुद्धि तत्क्षण खंडन कर देगी कि चलो हम मान लेते हैं कि ईश्वर में सुख होगा किन्तु संसार में भी तो सुख है। इतना ही नहीं, संसार का सुख करतलगत है, प्रत्यक्ष है, अनुभूत है, उसे छोड़कर अन्धेरे में क्यों पड़ें ? तब फिर मन का अनुराग ईश्वर में कैसे होगा ? कहना सुगम है, करना कठिन हुआ करता है। ऐसे भोले विचारक सोचें कि मरुस्थल के उड़ते हुए जिन बालू के कण को, सूर्य के प्रकाश में देखकर हिरन को यह विश्वास हो जाता है। कि वहाँ पानी अवश्य है, वह मर कर भी अपने विश्वास को नहीं छोड़ता, उसी प्रकार 'संसार में सुख है', यह विश्वास जब तक बुद्धि में जमा है, अनन्तबार मर कर भी हम अपना निश्चय नहीं बदल सकते। यही आशा बनी रहेगी कि अब सुख मिलेगा, अब सुख मिलेगा।

अतएव यह कहना अपने आपको धोखे में डालना मात्र है कि सीधे मन भगवान् में लगा दो, बस, सब काम ठीक हो जायगा। मन लगाने वाला कौन होगा? आप जानते हैं मन का शासक कौन है ?

अब आप सोचिये कि जब एक दर्शक विराट् रूप में देखकर डर रहा है तो सब विभोर कैसे होंगे? विभोर तो वे ही हुए जो अधिकारी थे, भक्त थे। बस, वे ही उन्हें देख सके |

अब आप समझ गये होंगे कि मन भगवान् में अपने आप अवतारकाल में भी नहीं लगेगा, फिर अवतारकाल न रहने पर तो प्रश्न ही नहीं पैदा होता। यदि मैं स्पष्ट कहूँ तो यह कह सकता हूँ कि यदि आप रामकृष्णादि भगवान् को समक्ष देख लें तो विभोर होने की बात तो दूर रही, शायद नास्तिक भी हो जायें, क्योंकि जब तक आप यह रहस्य न जान लें कि उनका वास्तविक रूप एवं कर्म दिव्य हैं तब तक प्राकृत दृष्टि में दीखने वाले प्राकृत शरीर एवं प्राकृत कर्म में कैसे ईश्वरीय भावना बना सकेंगे ? अस्तु, हमें किसी पथ प्रदर्शक की आवश्यकता होगी।

निष्कर्ष:
इस ब्लॉग में, जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज ने वैराग्य के स्वरूप को समझाया है। वे कहते हैं कि वैराग्य का अर्थ मन की आसक्ति से मुक्त होना है, चाहे वह प्रेम से हो या द्वेष से। वैराग्य में मन का स्थिरीकरण और दिव्य भावना को स्थायी बनाना आवश्यक है। वे बताते हैं कि वैराग्य द्वारा ही हम आत्म-स्वरूप को शुद्ध करके आनंदमय जीवन का अनुभव कर सकते हैं। उन्होंने यह भी दिखाया है कि वैराग्य के द्वारा मन को संसार के राग-द्वेष से मुक्त करना संभव है, और भगवान् की शरण में स्थिर भाव से रहने से हम आत्मिक सुख प्राप्त कर सकते हैं।

उन्होंने विचारणीय यह भी बताया है कि वैराग्य वासना के निर्माण से नहीं रोका जा सकता, क्योंकि जन्मों के संस्कारों के कारण वासना स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है। इसलिए वैराग्य के द्वारा मन को राग-द्वेष से ऊपर उठाकर भगवान् की शरण में स्थिरता से रहने में सफलता हो सकती है। वैराग्य के माध्यम से हम अपने परमानन्द स्वरूप ईश्वर की शरण में पहुंच सकते हैं यह एक दुर्लभ अवसर है जो हमें संसार के फंदे से मुक्त कर सकता है। वैराग्य की ध्यान रखते हुए हमें ईश्वरीय मार्ग का अनुसरण करना चाहिए, जिससे हम आत्मिक सुख को प्राप्त कर सकें।

इस ब्लॉग ने हमें वैराग्य के महत्वपूर्ण सिद्धांतों के प्रति जागरूक किया है और हमें अपने आत्म-स्वरूप की खोज में प्रेरित किया है। यह ज्ञान हमें सुखी और शांतिपूर्ण जीवन जीने के मार्ग में मदद करेगा। इस ब्लॉग को पढ़कर हमें स्वयं के विकास में सहायता मिलेगी और हम आनंदमय जीवन का अनुभव कर सकेंगे।

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